प्रेम को सींचती,बढ़ रही कविता है।
ज़िंदगी को सकल, गढ़ रही कविता है।।
कर जतन, दर्द पीड़ा सहेजे हृदय
चांद के शीर्ष पर, चढ़ रही कविता है।।

✍️अंजली श्रीवास्तव

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